Friday, June 24, 2016

ओ चिड़िया

-जयप्रकाश श्रीवास्तव

ओ चिड़िया
आंगन मत झांकना
दानों का हो गया अकाल

धूप के लिबासों में
झुलस रही छांव
सूरज की हठधर्मी
ताप रहा गांव
ओ चिड़िया
दिया नहीं बालना
बेच रहे रोशनी दलाल।

मेड़ के मचानों पर
ठिठुरती सदी
व्यवस्थाओं की मारी
सूखती नदी
ओ चिड़िया
तटों को न लांघना
धार खड़े करेगी सवाल।

अपनेपन का जंगल
रिश्तों के ठूंठ
अपने अपनों पर ही
चला रहे मूंठ
ओ चिड़िया
सिर जरा संभालना
लोग रहे पगड़ियां उछाल।
         
-जयप्रकाश श्रीवास्तव 

गीतों के गाँव

-मुकुट सक्सेना

तुमने क्यों
खींच दी लकीरें
दर्पण पर
बिना अर्थ जानें?

क्वांरी अभिव्यक्ति के
हृदय से
यौवन का भार
तड़प रहा
मर्यादित छन्दों के
जाने उस पार

डालो मत
जंजीरें ऐसे क्षण
इच्छा के पाँव
कीलो मत
कीलों से
ठौर-ठौर
गीतों के गाँव

पल भर उड़ने दो
सपनों को
पंखों पर
नये क्षितिज पाने।

स्यानी
अभिलाष का
मनमोहक
मौन मुखर रूप
झुलासाए नहीं
कहीं चितकबरी
आषाढ़ी धूप

कुंजों में साधों की
छांह घनी
बैठो उस ओर
गाओ फिर
मेघ-राग प्यासे हैं
आशा के मोर

अभी और
रहने दो वंशी को
अधरों पर
गीत मधुर गाने !
   
-मुकुट सक्सेना

पृथ्वी पर हस्ताक्षर

-मुकुट सक्सेना

रोज़ सुबह उगता जो
इन्द्रधनुष आँखों में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या ?

पीड़ा के जल में ही
शुभ्र कमल खिलते हैं
दुर्दिन के भौंरे
मकरन्द लिये मिलते हैं
जीवन का स्पंदन
फूल और परागों में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या?

इच्छा के मरुथल में
तृष्णा है अन्तहीन
खोज रहे तृप्ति मगर
पास नहीं दूरबीन
सरस्वती जल बहता
अब भी मरु के तल में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या?

सूर्य नित्य करता है
पृथ्वी पर हस्ताक्षर
और प्रकृति पढ़ती है
उसका हर-हर अक्षर
कालचक्र गतिमय है
क्षण-क्षण नव सर्जन हित
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या ?
           
-मुकुट सक्सेना

रीते घट सम्बंध हुए

-संध्या सिंह

सूख चला है जल जीवन का
अर्थहीन तटबंध हुए
शुष्क धरा पर तपता नभ है
रीते घट सम्बंध हुए

संदेहों के कच्चे घर थे
षड्यंत्रों की सेंध लगी
अहंकार की कंटक शैया
मतभेदों में रात जगी
अवसाद कलह की सत्ता में
उत्सव पर प्रतिबन्ध हुए

ढाई आखर वेद छोड़ कर
हम बस इतने साक्षर थे
हवन कुंड पर शपथ लिखी थीं
वादों पर हस्ताक्षर थे
रस्म रिवाजों की शर्तों पर
कच्चे सब अनुबंध हुए

-संध्या सिंह

ये कैसे बंटवारे गम के

-संध्या सिंह

घाव दर्द मुस्कान ठहाके
मिले धरा पर बिना नियम के
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं अमीरी के बक्से में
सोना-सोना ख़्वाब धरे हैं
कहीं फटी किस्मत का पल्लू
सिक्का-सिक्का स्वप्न मरे हैं  
जहाँ किश्त पर नींद मिली हो
वहीं फिक्र के डाकू धमके

कहीं कुतर्कों से ‘आज़ादी‘
रोज़ नयी परिभाषा लाती
कहीं रिवाजों के पिंजरे में
चिड़िया पंख लिए मर जाती
जहाँ भूख से आंत ऐंठती
वहीं पहाड़े हैं संयम के

जहाँ लबालब नदिया बहती
वहीं बरसते बादल आ कर
जहाँ धरा की सूखी छाती
धूप बैठती पाँव जमा कर
जहाँ थकी हो प्यास रेत में
वहीं भरम का पानी चमके

-संध्या सिंह

नहीं मील का पत्थर कोई

-संध्या सिंह 

कितनी दूर चले हैं जाने
कैसे जीवन पथ पहचाने
नहीं मील का पत्थर कोई
दिखा सफ़र में गड़ा हुआ

खुशियाँ जंग लगे बक्से में
बंद पोटली के भीतर
ताले लगे विवशताओं के
मुस्कानो पर कड़ी नज़र
सपना चारदीवारी भीतर
पंजो के बल खडा हुआ

दंड मिला तितली को वन में
फूल फूल मंडराने पर
हवा स्वयं ही चुगली करती
शाखों के लहराने पर
पाबंदी के तंग शहर में
जंगल का मृग बड़ा हुआ

परिवर्तन ने पंख दे दिए
पर रस्मों ने डोर कसी
घर–बाहर के बीच जंग हैं
दरवाजे में देह फँसी
बहती गयी उमर नदिया-सी
मन जिद्दी-सा अड़ा हुआ

-संध्या सिंह

विडम्बना

 -संध्या सिंह

गहन उदासी के आँगन को
उत्सव दिखना था
बालू के पन्ने पर हमको
दरिया लिखना था

पथरीला सच पाँव तले था
मिट्टी के सपने सर पर
द्वेष ईर्ष्या के गड्ढों से
भरसक चले सदा बच कर
मगर जहाँ पर मिली ढलाने
रस्ता चिकना था

पंखों की सब रद्द उड़ाने
कुहरे का परिवेश मिला
बूँदों को काजल की हद में
रहने का आदेश मिला
घूम-घूम कर एक नोक पर
लट्टू  टिकना था

-संध्या सिंह

Sunday, March 06, 2016

हरा अँगरखा

-नईम
पीली पगड़ी, हरा अँगरखा
पहने खेत कपास के

कच्ची उम्र, मालवी दूल्हों
जैसे ये नन्हें पौधे
नज़र न धरती की लग जाए
बिजुरी बनजारिन कौंधे
भरी देह वस्त्रों न समाए
जीवन जिए समास के

चले आ रहे रूप लुटाते,
अगहन पूस के ये झोंके
पके ज्वार के खेत मड़ैया,
बेटे चढ़े किसानों के
रुके हुए रथ, साथ चल रहे
धरती के, आकाश के

स्वजन बाराती उड़द साँवले,
मक्की मूँगा तिलक करे
लिपे-पुते घर पनहारिन ये
धूप नदी-तट कलश भरे
अरहर ने पग पायल पहनी
गाए गीत उजास के

-नईम 

फंदा ढीला है

-नईम
जोड़-जोड़ गठिया का मारा
मौसम सीला है

खोलूँ जब तक, दुष्ट हवाओं ने
जड़ दिए किवाड़
काटूँ कैसे? शस्त्र भोथरे
ये पल हुए पहाड़
खूँटे से बँध गया हर
कदम चुभता कीला है

साँझ बसाई बस्ती जो
यह सुबह उजड़ जाए
किसे पुकारूँ, पता नहीं
कब साँस उखड़ जाए
डोरे नहीं, गुलाबी रंग
आँखों का पीला है

भूल-चूक, लेनी-देनी जो
कहा-सुना हो माफ
हर दुकान पर पाए मैंने
कद से ओछे माप
फाँसी से इनकार किसे
पर फंदा ढीला है

-नईम 

डा० जगदीश व्योम

== नईम जी के नवगीतों पर टिप्पणी ==
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जिस प्रकार मालवा की माटी और वहाँ की आबोहवा को महसुस किया जा सकता है उसका वर्णन कर पाना मुश्किल है ठीक उसी तरह से नईम जी के नवगीतों को पढ़कर जो सुखद अनुभूति होती है उसे हूबहू कह पाना या लिख पाना बड़ी चुनौती है।  नईम जी के नवगीत आदर्श नवगीत हैं। उनकी भाषा एक अलग तरह का अहसास कराती है, वे मात्राएँ या वर्ण गिन गिनकर नवगीत नहीं लिखते बल्कि मात्राएँ नईम जी के नवगीतों में अपने आप फिट बैठती जाती हैं, लय और प्रवाह ऐसा कि मानो रेवा का प्रवाह हो, कथ्य इतना मौलिक और इतना प्रभावशाली कि नईम का नवगीत पढ़ने के बाद कई कई दिन तक चेतन और अवचेतन में वही और सिर्फ वही गूँजता रहता है। नईम के नवगीतों को संगीत के साथ गाओ, पहाड़ पर गुनगुनाओ, आदिम वस्ती में पढ़ो या नगरों, महानगरों में बाँचो..... सब जगह प्रासंगिक सब जगह लोकप्रिय..... यही है नवगीत की पहचान और यही है नवगीत की सफलता का रहस्य..... और यही वह बिन्दु है जहाँ नईम और नवगीत दोनों मिलकर एक हो जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं....... ऐसा लगता है कि नईम अपने नवगीतों के आखर आखर में बिखर कर फिर फिर हमारे साथ आते रहते हैं........... 
-डा० जगदीश व्योम