Wednesday, December 30, 2015

बंद खिड़कियों जैसा मन है

कोई तो सांकल खटकाए
बंद खिड़कियों जैसा मन है

अन बोला ही बना हुआ है
खुद से ही ना जाने कब से
हम छिपने के ढूंढ रहे है
कितने नए बहाने कब से

खुद के ही प्रतिपक्षी है हम
खुद से ही अपनी अनबन है

अपने ही भटकावों का खुद
हमको ही अनुमान नहीं है
इस घर में बाकी सबकुछ है
केवल रौशनदान नहीं है

धूप नही देखी है कब से
पैठ गयी अंदर ठिठुरन है

खुद से ही स्पर्धा करते है
खुद से पीछे छूट रहे है
कद में बौने हुए जा रहे
इतने ज़्यादा टूट रहे है

होंठो पर संवाद  नहीं है
मौन हो गए सम्बोधन है

गांठे मन की खुले, घरौंदे
आपस में बोले, बतियाए
सब की छत पर थोड़ी-थोड़ी
उजली धूप उतारकर आए

साध सधे प्यासी तुलसी की
इसी प्रतीक्षा में आँगन है

- चित्रांश वाघमारे

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