Wednesday, December 30, 2015

राम खो गए दंडक वन में

-चित्रांश वाघमारे

ढूँढू कहाँ, कहाँ से पाऊँ ?
विश्वामित्र पड़े उलझन में
राम खो गए कहीं अचानक
घने,अँधेरे दंडक वन में

केवट की नौका गंगा के
पार अभी तक लगी नहीं है
जीवित है  मारीच सुबाहू
अभी दिव्यता जगी नहीं है
सहमी हुई हवा बहती है
पंछी है भयभीत विजन में

घर घर में होती रहती है
सीता - सी नारी की निंदा,
पाँव पसारे लंका नगरी
बेबस लगती है किष्किंधा
बाट अहिल्या जोह रही है
कब से भरकर प्राण नयन में

समय यहाँ हनुमान सरीखा
प्रतिबंधों में कसा हुआ है
आज अवध के सिंहासन पर
दशकंधर ही बसा हुआ है
निर्वासित होती सज्जनता
दानव बसते देव-सदन में

सदियों पहले जो होता था
नई सदी की कथा वही है,
अब भी अहंकार की माया -
तिल भर को भी झुकी नहीं है
फिर कोई दशरथ व्याकुल है,
कैकेयी फिर कोप भवन में

पर युग के अपरूप वृक्ष पर
कभी सुदर्शन पुष्प खिलेंगे
सबकी साध साधेगी सबको
अपने अपने राम मिलेंगे
राम न दिखते बाहर, इनको
सदा खोजना अंतर्मन में

     -चित्रांश वाघमारे

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