Wednesday, December 30, 2015

छंद गिरवी रख दिए है

-चित्रांश वाघमारे

आओ कलमकारों उठो अब
गीत की गरिमा बचाओ,
भूख से टूटी कलम ने
छंद गिरवी रख दिए है ॥

है कहाँ अवकाश अब
कवि क्यों समय से द्वंद्व ठाने,
ढूँढ़ते है अब सभी जन –
कोष भरने के बहाने ।

बुझने लगे है वे दिए जो
पूर्व में बाले हुए है,
और हमने पूर्व के –
अनुबंध गिरवी रख दिए है ॥

अब निराला भी नहीं है
है नहीं दिनकर कही पर,
मंद पड़ती काव्यधारा –
ढल रहे है कोकिला स्वर ।

झरने लगे है पुष्प सारे
वाटिका मिटने लगी है,
और हमने पूर्व के –
मकरंद गिरवी रख दिए है ॥

शब्द बोझिल अर्थवाली
उलझनों में खो गए है,
शब्द है बोझिल यहाँ या –
अर्थ बोझिल हो गए है ?

अर्थ छीने, भाव छीने
शब्द से पर्याय छीने,
 मूल्य देकर शोक का –
आनंद गिरवी रख दिए है ॥

     -चित्रांश वाघमारे

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