Wednesday, December 30, 2015

कैसे तलाशें छाँव

-चित्रांश वाघमारे


हर तरफ केवल तपन
कैसे तलाशें छाँव ॥

झेलती है हर कली
अब द्रौपदी सी,
मौसमी दुःशासनों के
घाव गहरे ।
पेड़ छलनी हो गया
शाखा विकल है,
हर कहीं पर घाव के
कुछ बिम्ब उभरे ।

नागफनियाँ उग रहीं है
मालती के गाँव ॥

राजपथ पर
स्वर्ण का मेला लगा है,
तृप्त होती
राजकोषों की पिपासा ।
टेरती पगडंडियाँ जब
राजपथ को
दे रहे कौटिल्य सब -
केवल दिलासा ।

हारती पगडंडियाँ ही -
पांडवों सी दाँव ॥

अब चतुर्दिक
धुंध छाई है शहर में,
एक भी अपनत्व वाला
स्वर नहीं है ।
गाँव के भी
व्याकरण बदले हुए है
 शोर में, संगीत में -
अंतर नहीं है ।

आज शीतलता नहीं है
बरगदो के ठाँव ॥

    -चित्रांश वाघमारे

3 comments:

Bhavana Tiwari said...

बहुत अच्छा नवगीत !!

Bhavana Tiwari said...

बहुत अच्छा नवगीत !!

Anonymous said...

आपका आभार ।

- चित्रांश वाघमारे