Wednesday, December 30, 2015

चित्रांश के नवगीत

साधुवाद आदरणीय भाई रामकिशोर दाहिया जी, आज आपने कमवयस किन्तु परिपक्व रचनात्मक संसार के धनी प्रिय चित्रांश वाघमारे के नवगीत पटल पर प्रस्तुत कर स्तुत्य कार्य किया । धन्यवाद बंधु । 
विविध विषयों से संदर्भित कथ्यों के ये गीत चित्रांश जी की सोच के फलक की व्यापकता दिखाते हैं । चित्रांश जी जहाँ मनुष्य की अपने ही मन की उलझनों, भटकावों को खँगालते हुए लिखते हैं "बंद खिड़कियों जैसा मन है /अपने ही भटकावों का खुद हमको ही अनुमान नहीं है "
वहीं घर परिवार के लिए श्रम करती हुई भी माँ के बेफिक्र होने को सुन्दर व्यञ्जना से भर देते हैं-
"हँसकर पल भर में ही अम्मा 
सारी फिक्र निचोड़ रही है "
ऐसी ही उल्लेखनीय पंक्तियाँ है "पत्र आया और आँखें 
खोलकर संवाद बोले "
भीड़ में अनुयायियों की 
हो सको शामिल तो ठीक "

है गहन तम पर दियों का 
टिमटिमाना तक मना है "

झेलती है हर कली
अब द्रौपदी सी 
मौसमी दु: शासनों के घाव गहरे "
चित्राश जहाँ बहुत निकट से कथ्य उठाते हैं वहीं सामाजिक असंगतियों पर भी अपनी बात कहते हैं । 
"राम खो गए दंडक वन में 'नवगीत में बहुत प्रभावी रुपक रच कर अद्भुत व्यञ्जना को धार दी गई है । 
एक बहुत ही प्यारा नवगीत है चित्रांश का 
नटनी सी, पतली रस्सी पर 
चलती रहती मेरी माँ 
भरती अपनेपन की मिट्टी 
उभरी हुई दरारों में "
हाँ अन्त में "भूख से टूटी कलम ने छंद गिरवी रख दिए " पर मेरा मानना है कि छंद गिरवी रखने वाले लोग तो गले तक अघाये अफरे लोग थे । निराला से लेकर दिनकर तक किसी ने छंद से समझौता नहीं किया । यद्यपि यह पूरा गीत भी बहुत सुन्दर और प्रभावी है । 
चित्रांश के नवगीतों में ठेठ गीतों की पुष्टता के साथ नवगीतपरक कथ्यात्मकता की सहज स्थिति देखी जा सकती है । परिपूर्ण प्रवाह के साथ नवगीत की चुनौती भरे विषयों पर सहजता से बात कहना ही रचनाकार की सफलता है । बहुत बधाई, शुभाशीष भाई चित्रांश । 

-राजा अवस्थी 

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