Tuesday, January 12, 2016

दमदार नवगीत

सर्व श्री विभूति नारायण राय, शैलेंद्र सागर, टी.राम जैसे कई ऐसे प्रशासनिक अधिकारी हैं जिन्होंने अपनी अफसरी को अपने सृजन पर कभी हावी नहीं होने दिया, बल्कि संवेदनशीलता के साथ सामान्य व्यक्ति के जीवन को सार्थक साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की है। श्री रवि शंकर पाण्डेय भी उसी श्रेणी में आते हैं। मंच पर प्रस्तुत सभी गीत अच्छे व सोद्देश्य हैं। वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था से वाबस्ता हैं। गीत  1. समय के साथ पुराने पड़ गए  व्यवस्था व समाज-सम्बन्धी मूल्यगत ढाँचों के प्रतिरोध में है। स्पष्ट उल्लेख है कि उसका तना "गुम्बद ढह रहा है" तो उद्बोधन है वार्ता / दलीलों को दरकिनार कर सक्रिय हो जाने का है। "आदमी /अन्याय कब से /सह रहा है /कर गुज़रने को समय कुछ कह रहा है"। क्रियाशीलता हेतु शब्द। गीत 2. में, क्योंकि संसद बहसों और चौपालें अफवाहों की हो कर रह गईं हैं और छह दशकों बाद भी देश के हालात बेहतर नहीं हो सके हैं,इसलिए गीतकार असन्तुष्ट है -"जन गण मन अधिनायकवाली यह तस्वीर अधूरी है।" अ-विकास पर सार्थक टिप्पणी। गीत 3. किसानी पर प्रकृति की मार और परेशान किसान के विवशता में दहाड़ कर रोने का द्रवीभूत कर देने वाला चित्रण है। संवेदना के धरातल पर वास्तविक अंकन।  गीत 4. किसान और गाँव के जीवन का एक और गीत।सही(जैनुइन) के बरक्स मतलबी-ढोंगी चरित्रों का यथार्थ चित्रण। गीत 5. देश के भूखे व बेबस लोगों की पक्षधरता और छलावा-चरित्रों के विरोध व क्रांति के आह्वान का गीत। इसमें भी वही सक्रियता का रेखांकन। गीत 6. यांत्रिक स्तर पर की जाती टिप्पणी व विरोध को गीतकार निरर्थक करार देता है। सदियों के अत्याचार का विरोध ज़मीनी स्तर पर करना होगा। "प्रायश्चित की वही ज़िन्दगी /हमें न जीनी है"। गीत 7. व्यक्ति के स्तर पर अवमूल्यित होते जीवन,पतनोन्मुखी-आचरण-संयुत चरित्र तथा उस पर भी धृष्टता निरन्तर अपनाये जाने पर तीखी टिप्पणी।"...ऊपर से है सीनाजोरी।" या "पानी सा मर गया हमारा।" गीत 8. स्त्री रूप चित्र गीत है। पर इसमें भी साहित्य व उसके सामाजिक सन्दर्भों का उल्लेख।सामाजिक सरोकारों से लैस। ये हैं उपर्युक्त गीत।सभी आम जन की स्थितियों का यथार्थ अंकन करते हैं। यथास्थितिवाद व जड़ता का विरोध करते हैं।सत्ता-व्यवस्था के ढोंग-छलावों का रेखांकन करते हैं। दशकों बाद भी आम व्यक्ति,विशेषत: कृषकों तथा ग्रामीणों के जीवन के दयनीय-शोचनीय हालातों के उत्तरदायी कारकों का प्रतिरोध ही नहीं करते, बल्कि ज़मीनी सक्रिय विरोध के लिए उद्बुध भी करते हैं। आम आदमी व उसके जीवन की बेहतरी के लिए दमदार गीतों के लिए श्री रविशंकर जी आपको बहुत बहुत बधाई  ! साधु ! 

-डॅा० सुभाष वसिष्ठ

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