Saturday, January 16, 2016

नई सदी का गाँव

[ छः ]

नई सदी में
ढूँढ़ रहा मन
गई सदी का गाँव।

बड़ी ललक के
साथ गया था देखूँ
वह बरगद
जिसके
नीचे जेठ-दुपहरी
रहती थी गद-गद
नाम-निशान
नहीं बरगद का
दिखी कहीं ना छाँव।

बट समीप ही
पनघट
जिसका
था मीठा पानी
पीकर तृप्त
सभी होते थे
तुलसी-रहमानी
वह भी चौरस
पटा पड़ा था
हुआ सुठांव, कुठांव।

ताल-तलैय्ये, खेत-
झोपडों में तब्दील हुए
खोज रहे बच्चे
किताब में
नीम और महुए
शहर गाँव में
आया कैसे
चुपके-चुपके पाँव।

महक खो
गई है रिश्तों की
बैठक है सूनी
देर नहीं
लगती घट जाती
पल में अनहोनी
घर-घर हैं
शकुनी के पाँसे
अपने-अपने दाँव।

-शैलेन्द्र शर्मा

1 comment:

Mamta Bajpai said...

अच्छा गीत बधाई