Sunday, January 03, 2016

परवशता के खेल खिलौने

[ तीन ]

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया 
कभी कर्ज के,
कभी फर्ज के,
बोझ उठाये बड़े बड़े

तनिक सायानी हुई
कि"गौरा" चूल्हा-चौका हाथ लिए है
बासन मांजे,
कंडे पाथे चकिया छोड़ी,
जाँत लिए है
रोज नदी से
जल भर लाती
सिर पर दो-दो धरे घड़े

उधर नियम से बाँग लगाए
नित्य सुबह मस्जिद का मुल्ला
अपने मुँह बह बूदी हाँके
खटिया पकड़े इधर निठल्ला
कितनी है मजबूत
कि पति के,
नित सहती कटु बचन कड़े

इधर-उधर जब पड़े दृष्टियाँ
दिखें गले में बंधी घण्टियाँ
सबके अपने-अपने कोल्हू
किसकी खोले कौन पट्टियाँ
परवशता के
खेल खिलौने,
देखा करती खड़े खड़े

     

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