Tuesday, January 12, 2016

साख हमारी

[ सात ]

कल तक जो थी
साख हमारी
रत्ती भर वह आज नही है
लाठी है
लेकिन लाठी में
अब वैसी
आवाज नही है
कद्दू छूरी पर गिरता है
या कद्दू पर
गिरती छूरी
कटना कद्दू को
पड़ता है यह
गरीब की है मजबूरी
हाकिम है
लेकिन हाकिम का
अब वैसा अंदाज़ नही है।

ऐसा नहीं
कभी पहले भी
नहीं हुई थी कोई चोरी
चोरी नहीं
डकैती है अब
ऊपर से है सीनाज़ोरी
पानी-सा
मर गया हमारा
अब हमको कुछ लाज
नही है।

वेसे तो
भर दिखने में
मौसम
लगता खुशगवार है
लेकिन अंदर
घुटन बहुत है
घटाटोप है अंधकार है
सब कुछ बदला
पर मौसम का
बदला हुआ मिज़ाज़ नही है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

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