Saturday, January 16, 2016

गले में फन्दा

[ तीन ]
       

दस रुपये की
प्यारी गुडिया
"टेडी-बियर"हजार का
कसने लगा
गले में फन्दा
"विश्वग्राम-व्यापार"का।

आलू भरे
पराठे भूले
ज़ीरा डाला छाछ
"पीज़ा-बर्गर"
अच्छे लगते
"कोल्ड-ड्रिंक" के साथ
"स्लाइस-माज़ा"
मन को भाये
आम लगे बेकार का।

चटनी और
मुरब्बे फीके
"सास-जैम" की धूम
लम्बा "पेग"
चढा के डाली
रही नशे में झूम
पानी-पानी
जिसके आगे
झोंका सर्द बयार का।

क्यारी-क्यारी
उगे "कैक्टस"
कमतर हुए गुलाब
लोक-संस्कृति
लगती जैसे
दीमक लगी किताब
भूल गये
 इतिहास पुराना
हम अपने बाज़ार का।

-शैलेन्द्र शर्मा

No comments: