Saturday, January 16, 2016

फेशबुक की दोस्ती

[ दो ]
         
खुली फेसबुक
हुई दोस्ती
''शीला-श्याम" मिले
यौवन की
दहलीज़ों पर थे
द्वार-अनंग खुले।

सोलह की
शीला थी केवल
सत्रह के थे श्याम
'इंटर-नेट'
पर 'चैटिन्ग'
करना मन-भावन
था काम
सच कहते हैं
दूर ढोल के
लगते बोल भले।

धीरे-धीरे
बढी गु-टुर-गूँ
फिज़ां हुई मदमस्त
चाहे-अनचाहे
समाज की
हुई वर्जना ध्वस्त
फिर उडान के
पहले ही
पाँखी के पंख जले।

"आनर-किलिंग"
श्याम के हिस्से
शीला को एकांत
और कोख में ही
"विप्लव" को
किया गया फ़िर शांत
अलग-अलग
साँचे पीढी के
किसमें कौन ढले।
   
-शैलेन्द्र शर्मा

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