Saturday, January 16, 2016

नवगीतों में सहजता

आज कीर्ति शेष डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी के आठ प्रांजल गीतों से जुड़ने का सौभाग्य मिला। विभिन्न आयामों को दर्शाते गीतों ने हृदय में गहरी छाप छोड़ी। भदौरिया जी का कानपुर से बहुत गहरा आत्मिक जुड़ाव था। वह जब भी पधारते उनके सम्मान में कार्यक्रम आयोजित होते थे। 'पुरवा जो डोल गई', समेत अन्य अनेक सुमधुर कण्ठस्थ गीतों का जब वह पाठ करते थे तो खुशनुमा समां बँध जाता था। उनका आत्मिक स्नेह मुझे भी प्राप्त था। गांव-शहर, घर-परिवार, सामाजिक- राजनीतिक, न्यायव्यवस्था हो या प्राकृतिक परिवेश से जुड़ा विषय हो उन्हें नवगीतों में सहजता से व्यक्त करने में महारत हासिल थी। प्रतीकों, बिम्बों, व्यंजनाओं का चित्रात्मक मनोहारी वर्णन करने के साथ ही नवगीत के स्वरुप के अनरूप वह उसकी भाषा का निर्धारण करते थे। हिंदी नव गीत में आपका अनन्य योगदान उल्लेखनीय रहेगा। मेरे मन मस्तिष्क में वह हमेशा विराजेंगे, उन्हें मेरा आत्मिक प्रणाम। ऐसे मनोहारी गीतों के प्रस्तुती करने के लिए बन्धु दाहिया जी को अनेकशः बधाई, धन्यवाद।

-देवेन्द्र सफल

No comments: