Sunday, January 03, 2016

जेठ दुपहरी

[ चार ]

 -डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

जेठ दुपहरी
हवा न ढुलके
गीत अगीत हुए पिडकुल के

ऊसर ठुठइल खेत लांघते
थके हिरन के पॉव खोजते
गहबर
छापक पेड़ छिउल के

प्यासे राही खाली छूँछे
मांगे लोटा-डोर न पूंछे
भइया !
कौन जाति किस कुल के

खड़े नसेड़ी उझके ताकें
हड़िया बंधी ताड़ की साखें
गिने न-पाप
दोख भूभुल के

पनही लगे पुजाने कोहबर
पूरी देह हँसे गुलमोहर
आँगन चुहल
चली खुल-खुल के

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