Sunday, January 03, 2016

दुर्दिन महराज

[ छः ]
-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

ड्योढ़ी
ऊपर फिर दुर्दिन
महराज विराजे

गेहूँ दबे
दाढ़ में ऋण की धान
बाढ़ की भेंट हुए
उम्मीदों के
बेटा-बेटी
ओढ़ पिछौरी लेट गए

मुँह लटकाए
गहने पहुँचे
बंधक के दरवाजे

वत्सल छाती को
तीखी-सी
एक छुरी की धार मिली
पिता-पुत्र के
बँटवारे में
आँगन को दीवार मिली

मिला मोतियाबिंद
सास के
आँख बहुरिया आंझे

पूजा के
कमरे में लाठी
आतंकित हो भजन भजे
ओसारे दहलीज
दुआरे सो-सो कर
कटु वचन,जगे

खींचा-तानी
मनमुटाव
के ढोल-नगाड़े बाजे

   

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