Sunday, January 03, 2016

भावों एवं कथ्य का सटीक प्रतुतिकरण

कीर्तिशेष आदरणीय शिवबहादुर भदौरिया जी का साहित्य जीवन्त भारत की अंतर्दशा का नितांत विश्लेषण करता है। नवगीतात्मक नवचेतना/नवसंचेतना का वैचारिक विवेचन पूर्णतम सीमा तक अपने गीत वैशिष्ट्य की पहचान प्रस्तुत करते हुए समस्त सार्थक नवगीत किसी आलोचना की परिधि से और समीक्षकात्मक दृष्टिकोण से पुनः पुनः पढ़कर साधकर समीक्षा के योग्य हैं।
हार्दिक नमन करता हूँ आदरणीय गीतात्मा को।
आज के व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्बंधों में आई क्षीणता को वास्तविक एवं मौलिक रूप में प्रस्तुत करते हुए ये पंक्तियाँ अति सूक्ष्म अवलोकन करती हैं परिवार का----
ढीले होते
कसते कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव।
सटीक विवेचन किसी कठिन शब्द के प्रयोग की आवश्यकता नहीं समझी आदरणीय ने।लेकिन अपने भावों एवं कथ्य का सटीक प्रतुतिकरण उचित किया।
"हवा बड़ी बदजात" इस नवगीत मे देशकाल परिस्थिति के प्रतिकूल होते आचरण से यथार्थतः सब कुछ छिन्न भिन्न होता दिखाई देता है।हवा को उचित बिम्ब के रूप में प्रयोग किया गया है---
अस्त व्यस्त
कर गई वस्तुएँ
हवा बड़ी बदजात।

तेरी पुण्य
कोख से उपजे
कर्ज कमीशन जुड़वाँ भाई----बहुत सटीक तीक्ष्ण कटाक्ष।

"जेठ दुपहरी" नवगीत में देशज लोकभाषाई लहजा न्याय कर रहा है हमारी लोकवाणी का।गाँव गिराँव में दूर दराज कोनों में बोले जाते अनगढ़ व्यवहारिक अव्याकरणिक आम बोल चाल की भाषा के शब्दों (ढुलके, पिडकुल, ऊसर,ठुठइल, गहबर,छापक,छिउल,छूँछे,लोटा डोर,उझके,हड़िया,दोख,भूभुल, पनही,कोहबर आदि) से नवगीत समाज के सर्वहारा वर्ग का भी न्यायगत प्रतिनिधित्व करता है।

"यहाँ सब चलता है" यह शीर्षक ही अपने आप में वृहद् अर्थ इंगित करता है। अपने आस पास की घटनाओं को देखकर भी यही लोग सोचते सहते हैं।
चिल्लाता है
वही कि
जिसका घर जलता है।

लेकिन बन्धु
वस्तुएं क्या असली हैं
उचित प्रश्न।

उपरोक्त समस्त आठ नवगीतों में मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह अंतिम नवगीत लयात्मक गेयता की दृष्टि से,भाव सम्प्रेषण की दृष्टि से, लय संपृक्ति के उच्चतम आकर्षण तक व्याप्त हुआ लगा।मन को सुखद अनुभूति हुई काव्यतम की।

मुझसे नहीं रहा जाता है

बिना तुम्हारी
छवि को देखे,
मुझसे नहीं रह जाता है।--आंतरिक अभिप्रेरणा

केवल प्राण बना देने से
काम अगर
चल जाता विधि का।
तो करता क्यों
सृजन बताओ इतनी
अनुपम
तन की निधि का।---- अद्भुत। कुछ लोग इसे दर्शन कहेंगे लेकिन कवि ने प्रेम और दर्शन का अनूठा सामन्जस्य दिया।

कोई कहे
रूप को माटी
मुझसे नहीं कहा जाता है।--- साकार सशरीर आत्मा का प्रत्यक्ष सौख्य निदर्शन।यही नितांत अनुभूति है जो चरम है स्नेह का।

बिन जल की
नदिया में मुझसे,
बिलकुल नहिं बहा जाता है।--- उचित बात।निराकार नहीं।साकार की अभिव्यक्ति उत्तम है।सगुणोपासना का सातत्य सुख।
सर्वोत्तम कृति आज की।
सम्प्रति कहना चाहूँगा कि कीर्ति शेष गीतकार की अन्यानेक नवगीत रचनाएँ पूर्व में पिताजी के सामीप्य से पढ़ने को मिलीं थीं।लेकिन पिछले आठ सालों से साहित्य से दूर रहने के कारण कुछ भी नहीं पढ़ पाया।आज जब आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी ने हम पाठकों पर अपनी दयादृष्टि दिखाई तो बिना लिखे रहा नहीं गया।
कवि ने पूर्णता के साथ अपने जीवन में सृजन का जो विकल्प रखा वह अद्भुत रहा।गाँव का पुट है तो साथ ही सामयिक विवेचना से भी अतिरेक हुआ है।दर्शन है।नेह है।स्नेह है।प्रेम की सुखद अनुभूति है।गीतात्मक वैशिष्ट्य का अनावरण उचित हुआ।
आपका यह रविवार का कार्यक्रम विरासत का अनूठा अनुकरण कर रहा है।
उपरोक्त टीप मेरे हृदय की उद्गार है।
हार्दिक प्रणाम आदरणीय शब्द-भाव शेष को।सादर।

-अवनीश त्रिपाठी
 गरएं, सुलतानपुर उ प्र

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