Tuesday, January 12, 2016

रोयें दहाड़ के

[ तीन ]

सावन सूखे
भरे न भादों
बहके-बहके
दिन अषाढ़ के
भाग्य हमारा रहे बाँचते
मौसम-
सूखे और बाढ़ के।

पार साल बूड़े उतराये
आसों-
सूखे की चपेट में
कमर एक ने
पहले तोड़ी
दूजा मारे लात पेट में
फिर भी
बोते रहे खेत हम
सस्ता मँहगा मूस-काढ़ के।

मौसम
धोखेबाज बहुत है
इसका कैसे करें भरोसा
खडी फसल की
बर्बादी-
ज्यों खिसक गया हो
थाल परोसा
औंधी कोठली और
बखारी
क्या रखते
हम का-माड़ के !

समय चक्र के
उलट-फेर में
यह कैसा अँधेर हो गया
कल तक जो
चेरापूँजी था
अब तो जैसलमेर हो गया
काँटा तक न
चुभा हो जिसके
वह क्या जाने दर्द दाढ़ के।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

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