Tuesday, January 12, 2016

तुम्हें देखकर

[ आठ ]

तुम्हें देखकर
मन में जैसे
एक
महाभारत होता है !

तुम चलती हो
एक हंसिनी
सँभल-सँभल-ज्यों
डग भरती है
पारिजात की
टहनी जैसे
हल्की जुम्बिश से
झरती है
बँधी झील के
जल में कोई
ज्यों बरबस लहरें
बोता है।

घर -आँगन में
बिखर गई तुम
ज्यों गेंदे
की पीली पंखुरी
अथवा छिड़क
गया है कोई
अक्षत हल्दी भर-भर
अंजुरी
पावन-पावन
जैसे कोई
गंगा जल से घर
धोता है।

तुम्हें देखकर
लगा कि कोई
इंद्रजाल
का मन्त्र पढ़ गया
ज्यों कबीर की
काली कामर, पर
केशव का रंग चढ़
गया
तेरे रूप कुंड पर
दिन भर
लगा रहा मन क्यों
गोता है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

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