Sunday, January 03, 2016

नवगीतों में वैसबारा की संस्कृति

वैसबारा की माटी में कुछ ऐसी खासियत है कि वहाँ साहित्य की फसल कुछ ज्यादा ही लहलहाती रही है। एक दो बार उधर जाने का अवसर मुझे भी मिला है। डलमऊ से लेकर रायबरेली तक जो कुछ लोक में बिखरा पड़ा है उसे डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया के नवगीतों को पढ़कर महसूस किया जा सकता है। उनके नवगीतों में वैसबारा की संस्कृति, वहाँ की लोक शब्दावली, वहाँ प्रचलित ठेठ शब्द जिस खास ठसक के साथ आते हैं वैसा अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। लगता है उन्होंने अपने नवगीतों में एक एक बात शोध कर करके लिखी है चाहे वह गाँव के चित्रण हों या राजनीति की बातें अथवा कतिपय अनुभूतियों के चित्रण... सब कुछ अनूठा-सा सब कुछ मौलिक-सा। और खास बात यह भी कि अपने उत्तराधिकारी के रूप में विनय भदौरिया जैसा नवगीतकार भी सौंपा है उन्होंने साहित्य जगत को। वे अपने नवगीतों के मिस हमेशा हमेशा याद किये जाते रहेंगे कभी रामकिशोर दाहिया के बहाने तो कभी किसी और के बहाने।
-डा० जगदीश व्योम

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