Sunday, January 03, 2016

कथ्य और शिल्प दोनों असाधारण

मेरे ज्येष्ठ मित्र यश:शेष डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया के आठों गीत सीधे अंतस् को छूते हैं! इनमें कथ्य आभ्यंतर से निकलकर आया है और सीधे कलेजे में घुसता है। आज नवगीत के अनेक पुरोधाओं को इनसे सीखने की आवश्यकता है, जो गीतों में जनजीवन नारों के रूप में थोपते हैं। गीतों की पुनर्प्रस्तुति में वर्तनी की त्रुटियों से सावधानीपूर्वक बचने की आवश्यकता होती है अन्यथा दोष गीतकार के माथे चला जाता है और भ्रम की उत्पत्ति भी होती है। भदौरिया जी के गीतों में विषय वैविध्य भी ध्यान देने योग्य है। इस प्रस्तुति के लिए मैं मञ्च का आभारी हूँ।
सुदूर पश्चिमी अफ्रीकी देश नाइजीरिया की राजधानी में बैठकर गीतों को पढ़ते हुए मैं स्वदेश के गाँव, घर, गलियों, खेत, जवारों में पहुँच गया। प्रस्तुति हेतु पुन: पुन: आभार! आठवाँ गीत तो अनुपम है...... रसविभोर कर गया। कथ्य और शिल्प दोनों असाधारण। डॉ. भदौरिया की पुण्य स्मृति को सादर रसमय नमन!
-डॉ. धनञ्जय सिंह

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