Saturday, January 16, 2016

भीतर के सन्नाटे

[ सात ]
   
   
ऊँची-ऊँची मीनारों में
बौने-बौने घर
तन तो छत के
नीचे रहता
मन भटके दर-दर।

बाहर से दिखते हैं जैसे
कोई राजमहल
पर भीतर के सन्नाटे से
जी है रहा दहल
घर में रहते हुए सैकडों
रहते हैं बे-घर।

वैसे तो सारी सुविधायें
हैं मीनारों में
लेकिन तंगी रहती है
घर-घर दीवारों में
जीवन सहज
नहीं फ़िर भी कुछ
उड़ते हैं बे-पर।

'ऊँच निवास
नीच करतूती'
दिखती है अक्सर
गुरबत रह-रह
जिसके आगे
पकडे अपना सर
मानवता
पर हावी पशुता-के
चुभते नश्तर।
   
-शैलेन्द्र शर्मा

2 comments:

Mamta Bajpai said...

अद्भुत गीत

Mamta Bajpai said...

अद्भुत गीत