Tuesday, January 12, 2016

एक छलावा है

[ पाँच ]

नई सदी में
नई सोच का
कैसा दावा है ?
बोतल नई शराब पुरानी
एक छलावा है
भूख बेबसी की
चेहरों पर
परतें जमी हुई
दरवाजे तक
आकर कोई
आहट थमी हुई
ज्यों सुरंग में
एक रोशनी
भूल-भुलावा है।

घिसे पिटे शब्दों के
सारे अर्थ
पुराने हैं
सही चोट को
सही अर्थ में
शब्दों से पाने हैं
सही समय पर
हमें बोलना
होगा धावा है।

क्या होगा
मौसम के इन
थोथे बदलावों से
जब तक क्रांति
न चलकर आए
नंगे पाँवों से
बाहर जमी बर्फ
अंदर तो
पिघला लावा है।

सपने नए
संजोये थी जो
अपनी आँखों में
वह पीढ़ी
सर फोड़ रही है
बन्द सलाखों मे
रंग-बिरंगी
चकाचौंध
बस एक दिखावा है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

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