Wednesday, January 13, 2016

ये जंगल एक अजूबा है

] पांच ]

तोते से मैना
यूँ बोली
ये जंगल एक अजूबा है

टहनी
शाखाओं से
लड़ती पत्ते
आपस में जूझ रहे
बूढ़ी जड़
मिट्टी से चिपकी
अपनी पीड़ा को
मौन गहे
खो गये कहाँ
सब संस्कार
अब आगे
क्या मंसूबा है।

सबके अपने-अपने
दल हैं, हर दल
दलदल में धँसा हुआ
वैसे तो चेहरों पर
लाली पर गला
सभी का फँसा हुआ
यूँ तो है
चहल-पहल लेकिन
मन सबका
डूबा-डूबा है।

भेड़ों ने आपस में
मिलकर अपना
प्रतिनिधि
इस बार चुना
रह गई धरी की
धरी चाल
स्यारों को
सबने खूब धुना
पर, खेल वही
सब ज्यों का त्यों
ये कैसा
‘व्योम’ अजूबा है।

भेड़ें आपस में
भिड़ बैठीं, हो गईं
खूब गुत्थमगुत्था
अब भेड़-भेड़िये के
भ्रम में है प्रश्नचिह्न
फिर अलवत्ता
है कौन भेड़
भेड़िया कौन
अब तक न
किसी को सूझा है।

-डा० जगदीश व्योम

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