Sunday, January 03, 2016

पक्के घर में कच्चे रिश्ते

[एक]

-डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया

पुरखा पथ से
पहिये रथ के
मोड़ रहा है गाँव

पूरे घर में
ईंटे पत्थर
धीरे-धीरे
छानी-छप्पर
जोड़ रहा है गाँव

ढीले होते
कसते-कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव

इसको उससे
उसको इससे
और न जाने
किसको किससे
तोड़ रहा है गाँव

गर्मी हो बरखा हो
या जाड़ा
सबके आँगन
एक अखाड़ा
खोद रहा है गाँव

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