Tuesday, January 12, 2016

बैठे ठाले

[ चार ]

बासी कढ़ी
बता कर ताज़ी
छोंक-छाँक कर मिर्च मसाले
गरमा-गरम
परोस रहे हैं
ये अपने सालों के साले।

नून तेल की
क्या चिंता जब
चूल्हा जले न इनके घर में
अपनी रोटी
सेंक रहे ये
घूम टहल कर टोले भर में
अब कोठार की
जगह इन्हीं के
मुँह में जड़ना होगा ताले।

बार-बार
जलते चूल्हे में
हांड़ी इनकी चढ़े काठ की
इच्छा भोजन
जीम रहे ये
लगे छदाम न एक गाँठ की
पितर पक्ष में
बन बैठे हैं
पूजनीय सब कौवे काले।

सूखे और
बाढ़ से चौपट
अपनी खेती सोलह आने
दाना एक
नहीं है घर में
अम्मा फिर क्या चली भुनाने
राज रोग
हर साल लग रहा
अपने घर अब बैठे ठाले।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

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