Sunday, February 14, 2016

महुआ काका

 -डा० विनय भदौरिया

अम्मा जैसी
प्यारी निमिया
बप्पा जैसे
आम लगे
हमें गाँव की
सोंधी-सोंधी, माटी
चारों धाम लगे

ठन्डी छाँव बाँटते
हरदम, पुरखों से
बरगद दादा
हरी-भरी आँगन की
तुलसी, दादी-
घर की मर्यादा
निर्विकार
पीपल का बिरवा
ज्यों अवतारी राम लगे

हैं टीले -पहाड़ से
भाई, नदियाँ
इठलाती भौजी
मीठी टाफी
बाँट रहे हैं
महुआ काका मनमौजी
गाय चराते
बाल-बृन्द सब
गोकुल के घनश्याम लगे

-डा० विनय भदौरिया

1 comment:

ajaybabu Jadon said...

बहुत ही शानदार आदरणीय