Thursday, February 04, 2016

भोर के उत्सव

-डा० मालिनी गौतम

बन्द आँखों में मचलते
भोर के उत्सव

अपने कांधों पर उठाये
रेशमी कुछ ख़्वाब
ढूँढ़ता वह डिग्रियों के
बल पे अदना जॉब
अर्थियाँ कागज़ की ढोना
कब तलक सम्भव

गाँव बैठा शहर के
द्वारे पसारे हाथ
लौट आयेंगे कभी वो
जिनने छोड़ा साथ
आस कोमल-सी
निगलता स्वार्थ का दानव

हल चलाते सोमला का
मन बड़ा चंचल
ढूँढ़ता वह बादलों में
ख्वाहिशों का जल
बालियाँ गेंहूँ की करती
नींद में कलरव

-डा० मालिनी गौतम

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