Friday, February 05, 2016

फागुनी आकाश

  -डॉ० सुभाष वसिष्ठ

राग रंजित ले हथेली
सुबह से ही
कसमसाता फागुनी
आकाश
एक युग से--
एक युग तक
क्षितिज अटकी प्यास

इस दिशा का गाल
कर दूँ लाल
या कि गहरी झील-सी
मदमत्त आँखों पर
हवा का
बाँध दूँ रुमाल
वेदना दाबे अधर में
धुआँ भी--
आँखों धुआँए
हँस-हँसाता काश
फागुनी आकाश

रंग टेसू के
नहीं सूखे
पंखुरी तक भिगोने को
नई साड़ी
धारयित्री की
महज़ भूखे
धूसरित आकांक्षाओं में
स्वयं ही
रंग भरता
क्या समय का पाश
कसमसाता--
फागुनी आकाश

-डॉ० सुभाष वसिष्ठ

3 comments:

Dr. Malti said...

भाई सुभाष जी की रचनाअों पर टिप्पणी
बोिझल जीवन को सहज करते 'फागुनी आकाश' गीत में ताजगी तो है ही साथ साथ वह प्रकृति से भी साक्षात्कार कराता है।सभी रचनाअों में शब्दों अौर भावों का समायोजन प्रभावशाली है।" सिसकती ढ़िबरी -आचमन को सिर्फ गम " से जहाँ निराशा का भाव छलकता है वहाँ दूसरी अोर " चप्पू बिन आसमान ---" में आशा कि किरण भी दिखाई देती है। 'रखी है सान' ,' उम्र गंधाती ' आदि शब्दों का सुन्दर प्रयोग । 'सोनिल गौरैया ' अब रचनाओं का हिस्सा बन कर रह गई है--बहराल प्रयोग अच्छा लगा । दिन का खिसकना यूँ तो स्वभाविक प्रक्रिया है किन्तु उसे 'बच्चे के बहलाने' से जोङ उसे अौर सशक्त बना दिया है । सामाजिक सरोकार अौर संवेदनाअों से भरपूर' आबादियों के मूल स्वर ' गीत मन को छू गया । जब तक ज़ख्म ताज़ा रहेगा टीस बनी रहेगी अौर संवेदनाएँ भी ----। "सान-धर दाँती" बहुत दमदार रचना है । सभी गीतों में पिरोये गये सुन्दर भावों के लिए अनेकानेक साधुवाद ।
डॅा॰ मालती

Anonymous said...

भाई सुभाष जी की रचनाअों पर टिप्पणी
बोिझल जीवन को सहज करते 'फागुनी आकाश' गीत में ताजगी तो है ही साथ साथ वह प्रकृति से भी साक्षात्कार कराता है।सभी रचनाअों में शब्दों अौर भावों का समायोजन प्रभावशाली है।" सिसकती ढ़िबरी -आचमन को सिर्फ गम " से जहाँ निराशा का भाव छलकता है वहाँ दूसरी अोर " चप्पू बिन आसमान ---" में आशा कि किरण भी दिखाई देती है। 'रखी है सान' ,' उम्र गंधाती ' आदि शब्दों का सुन्दर प्रयोग । 'सोनिल गौरैया ' अब रचनाओं का हिस्सा बन कर रह गई है--बहराल प्रयोग अच्छा लगा । दिन का खिसकना यूँ तो स्वभाविक प्रक्रिया है किन्तु उसे 'बच्चे के बहलाने' से जोङ उसे अौर सशक्त बना दिया है । सामाजिक सरोकार अौर संवेदनाअों से भरपूर' आबादियों के मूल स्वर ' गीत मन को छू गया । जब तक ज़ख्म ताज़ा रहेगा टीस बनी रहेगी अौर संवेदनाएँ भी ----। "सान-धर दाँती" बहुत दमदार रचना है । सभी गीतों में पिरोये गये सुन्दर भावों के लिए अनेकानेक साधुवाद ।
डॅा॰ मालती

Drgirish Sharma said...

फाल्गुनी आकाश
डॉ वसिष्ठ आपका यह प्रेमगीत रागरंजित प्रकृति का मानवीकरण की शोभा से मंडित है | मुझे बहुत भाया | इसमें प्रकृति के माध्यम से आकाश और धारयित्री को नायक नायिका बनाकर प्रेम के उदाप्त गहन और विस्तृत रूप का व्यापक चित्रण है| वह निश्चय ही श्लाघ्य है| प्रकृति के माध्यम होने के बाबजूद यह गीत वर्तमान से जोड़ता है| निश्चय ही शिल्प की दृष्टि से यह पुष्ट गीत है| सुगठित छंद की यह अद्भुत छटा है | मुझे इस गीत की सबसे अच्छी पंक्ति लगी
" एक युग से एक युग तक
छितिज अटकी प्यास"
क्यों की मूल रूप से आकाश की यह प्यास ही गीत को निरन्तर गतिशीलता प्रदान कर रही है | यह इसका आधारविन्दु है|
आपको बधाई
डॉ गिरीश
मथुरा