Friday, February 05, 2016

आबादियों के मूल स्वर

-डॉ० सुभाष वसिष्ठ         

बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा
हवा के सही जीने का
हुआ कब ठोस अंदाज़ा

रखी है सान
फिर हथियार पर
कुछ और स्याही ने
भरे सुनसान ने
घेरे हुए हैं
बिफर कर ज़ीने
इन्हीं सबके बीच
तृतीया दृष्टि थिरका जा

टूटकर गिर न जाऍं
सहीपन के
बिन्दु आकाशी
महज़ कुछ
वक़्त टुकड़े
न कर दें गन्ध को बासी
खुली आबादियों के
मूल स्वर छा जा
       
-डॉ० सुभाष वसिष्ठ

2 comments:

Aradhana Rai said...

सुंदर भाव डॉ स्सहब

Drgirish Sharma said...

आवादियों के मूल स्वर
इस गीत की प्रारंभिक पंक्ति अदभुत है |
उल्लेखनीय बात यह है की प्रत्येक व्यक्ति जिसे जख्म मिल गया हो, को यथाशीघ्र मरना चाहता है | लेकिन विचित्र बात यह है की गीतकार उस जख्म को ताजा बनाये रखना चाहता है | इसके पीछे उसका उद्देश्य किसी भी क्षण विभ्रम में न पड़कर सदैव सजग, और सतर्क बने रहना है, जिससे व्यक्ति निर्वाद रूप में सक्रिय बना रहे |
गीतकार इस बात के लिए सजग है और सचेत करता भी है, कि अंधकार विभिन्न रूपों में व्यक्ति को घेरे रखना चाहता है इसलिए गीतकार ऐसी स्तिथि में रहता है –
“ इन्हीं सब बीच तृतीया दृष्टी थिरका जा ” | शिव के तीसरे नेत्र के प्रकोप के पौराणिक मिथक के माध्यम से गीतकार समाज के कल्याण के लिए विद्रोह और विध्वंस की बात करता है | मैं गीतकार के इस विन्दु से और सर्वमान्य कथन से सहमत हूँ की विध्वंश के बाद ही / भी निर्माण होता है | इस पंक्ति की दिव्यता, देखते ही बनती है |
अंतिम पंक्ति का दिव्य भाव गीत के अंतिम चरण में समाज के प्रति गीतकार की आकांक्षा स्पष्ट होती है | वह यह कामना करता है सही व्यक्तियों के सही विचार किसी भी काल खंड का शिकार न बन जाये | वे टूट कर विखर न जाएँ ; उनके सद्विचारों और सदभावनाओं की सुगंध कभी भी बसी / पुरानी न पड़े | इस प्रष्ठ भूमि में गीत की अंतिम पंक्ति में विचारों, दर्शनों की किसी भी प्रकार की कूपमंडूकता को गीतकार निरस्त करता है | उसके स्थान पर रूढीमुक्तता के मूल स्वर / आधार को संपूर्ण विश्व समाज पर जाने की कामना करता है |
(चर्मोकर्ष)
अति सुन्दर – मन भावन – बधाई
डॉ. गिरीश
मथुरा