Sunday, March 06, 2016

डा० जगदीश व्योम

== नईम जी के नवगीतों पर टिप्पणी ==
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जिस प्रकार मालवा की माटी और वहाँ की आबोहवा को महसुस किया जा सकता है उसका वर्णन कर पाना मुश्किल है ठीक उसी तरह से नईम जी के नवगीतों को पढ़कर जो सुखद अनुभूति होती है उसे हूबहू कह पाना या लिख पाना बड़ी चुनौती है।  नईम जी के नवगीत आदर्श नवगीत हैं। उनकी भाषा एक अलग तरह का अहसास कराती है, वे मात्राएँ या वर्ण गिन गिनकर नवगीत नहीं लिखते बल्कि मात्राएँ नईम जी के नवगीतों में अपने आप फिट बैठती जाती हैं, लय और प्रवाह ऐसा कि मानो रेवा का प्रवाह हो, कथ्य इतना मौलिक और इतना प्रभावशाली कि नईम का नवगीत पढ़ने के बाद कई कई दिन तक चेतन और अवचेतन में वही और सिर्फ वही गूँजता रहता है। नईम के नवगीतों को संगीत के साथ गाओ, पहाड़ पर गुनगुनाओ, आदिम वस्ती में पढ़ो या नगरों, महानगरों में बाँचो..... सब जगह प्रासंगिक सब जगह लोकप्रिय..... यही है नवगीत की पहचान और यही है नवगीत की सफलता का रहस्य..... और यही वह बिन्दु है जहाँ नईम और नवगीत दोनों मिलकर एक हो जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं....... ऐसा लगता है कि नईम अपने नवगीतों के आखर आखर में बिखर कर फिर फिर हमारे साथ आते रहते हैं........... 
-डा० जगदीश व्योम

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