Sunday, March 06, 2016

हरा अँगरखा

-नईम
पीली पगड़ी, हरा अँगरखा
पहने खेत कपास के

कच्ची उम्र, मालवी दूल्हों
जैसे ये नन्हें पौधे
नज़र न धरती की लग जाए
बिजुरी बनजारिन कौंधे
भरी देह वस्त्रों न समाए
जीवन जिए समास के

चले आ रहे रूप लुटाते,
अगहन पूस के ये झोंके
पके ज्वार के खेत मड़ैया,
बेटे चढ़े किसानों के
रुके हुए रथ, साथ चल रहे
धरती के, आकाश के

स्वजन बाराती उड़द साँवले,
मक्की मूँगा तिलक करे
लिपे-पुते घर पनहारिन ये
धूप नदी-तट कलश भरे
अरहर ने पग पायल पहनी
गाए गीत उजास के

-नईम 

1 comment:

MANOJ JAIN "MADHUR" said...

【विशुद्ध व्यंजना के कवि】
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●नईम
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संवेदनात्मक आलोक के भव्यतम मंच पर आज कीर्ति शेष नईम के दिव्यतम नवगीतों की प्रस्तुति है ।
कवि नईम कबीर की परम्परा के एक स्थाई स्तम्भ ही थे
भारत भवन ,भोपाल के एक आयोजन में उनसे भेंट और उन्हें सुनने का सुअवसर मुझे भी मिला है आज के अंक में उन्हें पढ़कर वे स्म्रतियां भी ताज़ा हुई।
उनके पास अद्भुत कथन भंगिमा थी
जोड़ जोड़ गठिया का मारा मौसम सीला है यहां कवि कि व्यंजना देखते ही बनती है गठिया रोग और मौसम में नमी के ध्वन्यार्थ हमें बहुत दूर ले जाते हैं
परिस्थितियां और मनः स्थितियां तो आज भी वैसी ही है वस इन्हें महसूसने और नए अर्थ और रूपाकार देने हमारे बीच कवि नईम भर नहीं हैं।
आत्मा को गिरवी रखकर सुविधा खरीदने की बात तो केबल कबीर धर्मा व्यक्तित्व ही ले अभिव्यंजित कर सकता है
गीतों में व्यंजक भाव वह भी नव्यता के साथ केबल नईम ही ला सकते थे कोई दूसरा नहीं तभी तो वे कहते हैं
छोटे हो गए आज
हम तुम अपने कद से
नईम विशुद्ध व्यंजना के कवि थे
और वे अपने बहाने पूरी दुनिया का मूल्यांकन करना जानते थे
देखिये एक पंक्ति
लाखों में कूता
अपने को
कभी अधेली से
नईम के नवगीत पटल पर साझा कर एडमिन रामकिशोर दाहिया जी ने एक पुण्य का काम किया है।
नईम की स्मृति को नमन
और एडमिन जी के सत्प्रयास को बहुत बहुत आभार

मनोज जैन मधुर