Friday, June 24, 2016

रीते घट सम्बंध हुए

-संध्या सिंह

सूख चला है जल जीवन का
अर्थहीन तटबंध हुए
शुष्क धरा पर तपता नभ है
रीते घट सम्बंध हुए

संदेहों के कच्चे घर थे
षड्यंत्रों की सेंध लगी
अहंकार की कंटक शैया
मतभेदों में रात जगी
अवसाद कलह की सत्ता में
उत्सव पर प्रतिबन्ध हुए

ढाई आखर वेद छोड़ कर
हम बस इतने साक्षर थे
हवन कुंड पर शपथ लिखी थीं
वादों पर हस्ताक्षर थे
रस्म रिवाजों की शर्तों पर
कच्चे सब अनुबंध हुए

-संध्या सिंह

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